तेरा बरामदा

आज भी जब उस राह गुज़रता हूँ,
नज़रें एक टक उस बरामदे पर चली जाती हैं.

खुद को झूठ ना बोल पाऊंगा,
हाँ, देखते ही यादेँ ताज़ा हो जाती हैं.

तू नहीं, पर तेरा एहसास आज भी है वहां,
इक भ्रम सी परछाई आज भी दिख जाती है.

उस कमरे की तस्वीर आज भी ज़हन में हैं छपी,
वह बरामदे का दरवाज़ा आज भी खुला नहीं है.

ना जाने किस घडी तेरे दर रखे थे कदम,
आज भी वह नासूर भरे नहीं हैं.

चाहता हूँ ढह जाए वह छज्जा इसी वक़्त,
जहां से तेरे निशाँ आज भी मिटे नहीं हैं.

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