यादों के कपड़े

कुछ दाग, कुछ सिलवट,
कुछ रेशे उधड़े हैं,
मैंने यादों के कपड़े अब उतार फेंके हैं.

विरह के चिथड़े अब ना समेटे जाते हैं,
फटे हाल इतने हैं ना सीए जाते हैं,
इसीलिए यादों के कपड़े उतार फेंके हैं.

जो दाग चढ़ा था तेरे रंग का,
वह बड़ी कोशिशों के बाद भी धुले नहीं हैं,
इसीलिए तो यादों के कपड़े उतार फेंके हैं.

हो गए हैं इतने तंग,
बदन पे चकत्ते पड़े हैं,
इसीलिए तो यादों के कपड़े उतार फेंके हैं.

अपना रंग चढ़ाके कोई नए कपडे लाया है,
इनको मेरी याद बना लो कह के मुझे भुलाया है,
मैंने भी अब उनको संजोये रखा है,
इसीलिए यादों के कपड़ो को उतार फेंका है.

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