तुम जितना भी चाहो,
समय को रोकना तुम्हारे वश में नही।
पर दिल तब भी कहता हैं,
काश में उसे रोक पता।
रोक लेता उन लम्हों को,
ठहरा देता उन पलों को;
जिनमें मैं गुज़ारना चाहता था सारी जिंदगी।
जानता था, समय अपनी राह पे चलता रहेगा,
ना तू रोक पाया था, ना मैं रोक पाऊंगा;
तो मैंने भी समेट लिया उन सारे पलों को अपनी तस्वीरों में।
पता हैं, आज भी जब तेरे उन पुरानी गलियों से गुजरता हूँ,
चाहे अनचाहे ये नज़रे उस बरामदे में तुझे ढूंढती हैं।
जहां कई बार तुझे देखा था,
और देखना चाहता था हर बार गुज़रते हुए।
उस बरामदे में खड़े देखा था हमने,
मौसमों को बदलते हुए।
मैं जानता हूँ तू आजकल वहां नही रहता,
पर तेरा साया अब भी वही दिखता हैं।
दिखती हैं वो आँखें, जो एक टक मेरे इंतेज़ार में रहती थी,
ताकि मेरे गुज़रते वक़्त कहीं वो मौंका चूक न जाये।
वो पल आज भी एक खूबसूरत छायाचित्र की तरह,
नज़रों के सामने चलती रहती हैं।
उस बस अड्डे पर बितायी वो शामें,
आज भी याद करती होँगी हमें।
कहती होगी; थे दो पागल,
जो घण्टो बातों में गुज़ारते थे अपनी शामें मेरे छत तलें।
वो पल भी रहते हैं मेरे आशियाने में,
जिसे रूप दिया था तूने और बनाया मेरे अंदर के चित्रकार ने।
आज भी वो तस्वीरे वही लटकी हैं,
जहां लगाकर गया था तू।
– अंकुर मंडल
