इन नंगे पैरो पर आज भी जब उस रेत पे चलता हूँ,
हां, तेरी याद आती हैं।
याद आता हैं वो पल जब इस रेत की तरह,
तेरे हाथ मेरे हाथों से फिसल रहे थे।
पागल लहरो की तरह तेरा प्यार,
मेरे पूरे तन को भिगोकर छोड़ जा रहे थे सिर्फ आंसू।
मेरे आसुओं से भीगे उस तन को,
माँ ने अपने आँचल तले छुपाने की बोहत कोशिश की।
मगर उन असुयों की परत इतनी थी,
की कभी वो चाहे भी तो छुपाये नही छुप सकती।
दर लगता हैं पीछे मुड़कर देखने से,
क्युके मेरा दिल जानता हैं कि तू आज भी वही हैं,
उन नंगे पैरो के निशा के साथ,
और उन रेतों पे जो आज भी मेरे हाथों पर लगी हैं।
– अंकुर मंडल
